कभी लहरों सा शोर सुनाती हूँ
कभी गुमसुम सी चुप कर जाती हूँ ।
कभी बागों में, कभी कलियों पर
कभी डालों पर लहराती हूँ ।।

दिल की धड़कन को सुनने को
कभी हौले से रुक जाती हूँ ।
दस्तक न सुन कर कोई वहाँ
फिर आगे मैं बढ़ जाती हूँ ।।

ख्वाबों में गर आहट हो
फिर उनमें मैं बह जाती हूँ ।
ख्वाब ही था, न कोई हकीकत
फिर आँखों को समझाती हूँ ।।

अपनों से प्यार जताने को
जाने क्या-क्या खेल रचाती हूँ ।
बिन बात के ही इठलाती हूँ
बिन बात के ही इतराती हूँ ।।

कोई बात छिड़े तो फिर उसमें
कभी नदिया सी बह जाती हूँ ।
कोई बात नहीं फिर भी यूं ही
कभी कुछ कहने से घबराती हूँ ।।

कभी अपनों से ही मैं लड़ जाती हूँ
कभी गैरों से प्यार जताती हूँ ।
फूलों को ताव दिखाने को
कभी काँटों को सहलाती हूँ ।।

दूर गगन के ख्वाब सजा
कभी तितली सी मंडराती हूँ ।
पूरा ना हो ख्वाब तो फिर
कहीं झुरमुट में छुप जाती हूँ ।।

कोई बात नहीं फिर भी अँखियों से
कभी बादल सा बरसाती हूँ ।
कभी बात बड़ी फिर भी नयनों को
बिन असुयन के तरसाती हूँ ।।

लोगों को राह दिखाने को
कभी कोई शमा जलाती हूँ ।
वो शक्स तो पा जाता है मंजिल
उस शमा से मैं जल जाती हूँ ।।

दिल से जो बनते हैं रिश्ते
हर उस रिश्ते में मैं बस जाती हूँ ।
अपनों का प्यार मैं पाती हूँ
और उन पर जान लुटाती हूँ ।।

छोटी छोटी बातों में
जाने क्या खुशियाँ पाती हूँ ।
कभी यूं ही मैं शरमाती हूँ
कभी खुद पर ही बलखाती हूँ ।।

मीठे-मीठे ख्वाब सजा
शायद खुद को बहलाती हूँ ।
पर जीवन के कुछ प्रश्नों से
अब तो, मैं भी, कुछ कुछ घबराती हूँ।।

प्रीती कैथवास

2 Thoughts to “मै”

  1. अच्छी कविता। इलाहाबाद कवियों, लेखकों, व्यंग्यकारों का गढ़ रहा है लेकिन अब वह लौ नहीं। नई कलम अब नए रूप में सामने है। स्वागत है…..

    Ranvijay Singh
    http://www.nationalwheels.com

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